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Thursday, 12 November 2015

तन्हाई

आवाज़ों का क़ाफ़िला है! 
फिर भी क्यों तन्हाई है ।

दोस्तों की महफ़िल है ! 
ना जाने क्यों फिर भी यूँ अकेला हूँ ।

रंग ही रंग हैं! 
पर सब बेरंग है ।

फूलों के मौसम में यह केसी पतझड़ है ! 

ख़ुशी के दिन हैं फिर भी ये उदासी है ।

बरसों बीत गये उस आँगन से विदा हुए
आज भी उस घर कि सब यादें ताज़ा हैं।