आवाज़ों का क़ाफ़िला है!
फिर भी क्यों तन्हाई है ।
दोस्तों की महफ़िल है !
ना जाने क्यों फिर भी यूँ अकेला हूँ ।
रंग ही रंग हैं!
पर सब बेरंग है ।
फूलों के मौसम में यह केसी पतझड़ है !
ख़ुशी के दिन हैं फिर भी ये उदासी है ।
बरसों बीत गये उस आँगन से विदा हुए
आज भी उस घर कि सब यादें ताज़ा हैं।
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